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भारत में सामाजिक परिवर्तन


भारत में सामाजिक परिवर्त


सामाजिक परिवर्तन, समाज के आधारभूत परिवर्तनों पर प्रकाश डालने वाला एक विस्तृत एवं कठिन विषय है। इस प्रक्रिया में समाज की संरचना एवं कार्यप्रणाली का एक नया जन्म होता है। इसके अन्तर्गत मूलतः प्रस्थिति, वर्ग, स्तर तथा व्यवहार के अनेकानेक प्रतिमान बनते एवं बिगड़ते हैं। समाज गतिशील है और समय के साथ परिवर्तन अवश्यंभावी है।
आधुनिक संसार में प्रत्येक क्षेत्र में विकास हुआ है तथा विभिन्न समाजों ने अपने तरीके से इन विकासों को समाहित किया है, उनका उत्तर दिया है, जो कि सामाजिक परिवर्तनों में परिलक्षित होता है। इन परिवर्तनों की गति कभी तीव्र रही है कभी मन्द। कभी-कभी ये परिवर्तन अति महत्वपूर्ण रहे हैं तो कभी बिल्कुल महत्वहीन। कुछ परिवर्तन आकस्मिक होते हैंहमारी कल्पना से परे और कुछ ऐसे होते हैं जिसकी भविष्यवाणी संभव थी। कुछ से तालमेल बिठाना सरल है जब कि कुछ को सहज हीस्वीकारना कठिन है। कुछ सामाजिक परिवर्तन स्पष्ट है एवं दृष्टिगत हैं जब कि कुछ देखे नहीं जा सकते, उनका केवल अनुभव किया जा सकता है। हम अधिकतर परिवर्तनों की प्रक्रिया और परिणामों को जाने समझे बिना अवचेतन रूप से इनमें शामिल रहे हैं। जब कि कई बार इन परिवर्तनों को हमारी इच्छा के विरुद्ध हम पर थोपा गया है। कई बार हम परिवर्तनों के मूक साक्षी भी बने हैं। व्यवस्था के प्रति लगाव के कारण मानव मस्तिष्क इन परिवर्तनों के प्रति प्रारंभ में शंकालु रहता है परन्तु शनैः उन्हें स्वीकार कर लेता है
बुद्धिजीवियों और लेखकों ने 20 वीं शताब्दी के दो बड़े आंदोलनों की भारी उपेक्षा की है। यदि उन्हें समर्थन मिलता तो बात दूसरी होती। कदाचित वे समस्याएं न देखनी पड़तीं, जिनसे हम आज गुजर रहे हैं। ‘त्रिवेणी संघ’।दूसरा ‘अर्जक संघ’। दोनों ही संगठन सामाजिक न्याय की भावना से अनुप्रेत थे। ‘त्रिवेणी संघ’ का गठन शाहाबाद, बिहार तथा ‘अर्जक संघ’ का गठनइलाहाबाद, उत्तरप्रदेश में हुआ था। दोनों का उद्देश्य था,दबी-पिछड़ी जातियों में आत्मसम्मान का भाव जाग्रत करना। उन्हें तथाकथित उच्च जाति के भू-सामंतों, जमींदारों, धर्म के नाम पर ठगी करने वाले पंडा-पुरोहितों से बचाना। ‘त्रिवेणी संघ’ पिछड़ी जातियों को राजनीतिक स्तर पर गोलबंद कर कांग्रेस के वर्चस्व को तोड़ना चाहता था, जो उन दिनों मुख्यतः सर्वर्णों का संगठन था। ‘अर्जक संघ’ का उद्देश्य तंत्र-मंत्र, जादू-टोने, पूजा-पाखंड में धंसे समाज में मानवतावादी, राष्ट्रीयतावादी एवं वैज्ञानिक सोच का विकास करना था

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